भोजपुरी के संवैधानिक मान्यता खातिर सांसदन से गोहार

प्रोफेसर रविकांत दूबे के अध्यक्षता वाला बिहार भोजपुरी अकादमी का ओर से लोकसभा के करीब एक सौ सांसदन के चिट्ठी भेज के गोहार लगावल गइल बा कि भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करावे खातिर ऊ लोग संसद में आक्रामक बाकिर सशक्त आ सृजनात्मक तरीका से आवाज उठावे. जवना सांसदन के ई चिट्ठी भेजल गइल बा तवनन में बिहार के सगरी सांसद शामिल बाड़े.

एह चिट्ठी में लिखल गइल बा कि करोड़ो भोजपुरिया भारतीयन के अस्मिता आ सम्मान के भाषा भोजपुरी संवैधानिक मान्यता ना मिलला का चलते अनेके तरह के सुविधा से वंचित राखल गइल बिया. जबकि एह से कम लोग के भाषा सिंधी, कोंकड़ी, मणिपुरी, संथाली, बोडो, डोगरी आ नेपाली भाषन के ई मान्यता दिहल जा चुकल बा. एह चलते भोजपुरी रोजी रोजगार के भाषा नइखे बन पावत. बतावल गइल बा कि बिहार के भोजपुरी पट्टी दुनिया के चार गो प्रधानमंत्री, अनिरुद्ध जगरनाथ, शिवसागर रामगुलाम. नवीन चंद्र रामगुलाम, आ कमला परसाद बिसेस्सर, दिहलसि. (हालांकि एह सूची में पता ना काहे बलिया के चंद्रशेखर के नाम छोड़ दिहल गइल बा. शायद एह चलते कि ऊ बिहार के ना युपी के रहले. बाकिर भोजपुरी के मुद्दा पर राज्य के आधार पर एह तरह के अनदेखी ना होखल चाहत रहुवे. )

अकादमी के चिट्ठी में बतावल गइल बा कि दुनिया के करीब पचीस देशन में आजु भोजपुरिया लोग अपना बल बूते देश के परचम फहरावत बाड़े. भोजपुरी साहित्य के एक हजार साल पुरान परंपरा रहल बा. अबही ले नाहियो त सात हजार से बेसी किताब भोजपुरी में छप चुकल बा आ पचासन पत्र पत्रिका निकलत बा. बाकिर एह सब का बावजूद भारत में सरकार भोजपुरी के अनदेखी करत बिया. (शायद ओही तरह जइसे अकादमी भोजपुरी के सेवा में लागल अनेके वेबसाइटन के टूटपूंजिया लोगन के सोचि के अनदेखी करत रहेले आ भोजपुरी के सेवा में, प्रचार प्रसार में दुनिया भर में भोजपुरी के झंडा फहरावत एह वेबसाइटन का मुकाबिले सौ दू सौ प्रतियन वाला किताबन के बेसी अहमियत दिहल गइल बा जवना में से बेसी ओह किताब के लेखक भा कवियन के जान पहिचाने ले सीमित रहि जाले. अगर अकादमी के ई बाति झूठ लागे त ओ ओह सात हजार किताबन में से सातो सौ किताब के प्रति देखा देव ! खैर छोड़ीं एह सब के. कुछ त सकारात्मक होखत बा एह चिट्ठी का मार्फत. वइसे ई उल्लेख कइल बहुते बेजाँय ना होखी कि अगर भोजपुरी इलाका के सांसद विधायक अपना अपना सदन में भोजपुरी में बोलसु त ओह लोग के वैधानिक तरीका से रोकल ना सकी काहे कि भारत सरकार के कानून भोजपुरी के हिंदी के उपभाषा मानेले अलगा भाषा ना आ हिंदी के सरकारी भाषा के मान्यता मिल चुकल बा. भले राष्ट्रभाषा के मान्यता आजु ले भारत सरकार नइखे दिहले हिंदी के !)

अगिला महीना राज्यसभा के सांसदनो के अइसने चिट्ठी भेजल जाई.


(अकादमी के पत्र का आधार पर अँजोरिया संपादक के टिप्पणियन का साथे)

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