नाक काँच ह बात साँच ह

– अमितेश कुमार

उमिर का मार से झूराइल ओह देहि में आजुवो उहे लोच बा. आंखि में चमक बढ़ि जाला जसही केहु नाच के नाम ले लेवेला. ऊ शान से रउआ के बतइहें कि मुजफ़्फ़रपुर के बाई जी के कइसे एक बेर ऊ हार मनवा दिहले रहले. लोग बाई जी के रोक के उनुकर नाच के देखे चाहल. आ केतना इनाम मिलल. वगैरह.

नागा के नाम से मशहुर नागेन्द्र हजरा आ अब नागेन्द्र पासवान के एक जमाना में एरिया में तूती बोले. नाच में भीड़ बिटोरे ला उनुकर नामे काफ़ी रहे. कई बेर तो उनका के राखे खातिर नाच पार्टियन में मार हो जाव ! आज नागा केस कटा लिहले बाँड़े. नाती पोता से भरल घर बा. खेती गृहस्थी करेलें. आ साल में बस एक दिन, छठ का दिने कुछ चुनिंदा लोग का घरे जा के कोसी लगे नाचेलें. काहे कि बरख-बरख से ऊ लोग उनका सुख दुख में साझा रहल बा. ‘बाकिर गांव में त बहूत भूप बा लोग’.

नागेन्द्र के जीवन में आज नाच नइखे लेकिन उनकर जीवन नाचे से बनल बा. अलग बाति बा कि उनका जीवन आ उनका जइसन अनेक कलाकारन के जीवन बनावे वाला नाच आजु खुदे मरनासन्न बा. नाच बिहार आ यू.पी. के कुछ इलाका के प्रसिद्ध नाट्य रूपो ह आ एक जमाना में मनोरंजन के बड़का साधन रहल. भोजपुरी के प्रसिद्ध नाटककार भिखारी ठाकुर के आपन “पार्टी” बनवला का पाछा जहाँ लीला नाटक रहे उहें दुसरका ओरि नाच. सही में देखल जाव त ऊ नाच के आपन आकार दिहलें. नाच में जवन पाठ खेलल जाव, ऊ अपना से तइयार करे लगलें आ एकरा मंचो के एगो स्थाई फ़रक दिहलें. लेकिन कइसे ? ई जाने खातिर आईं तनिका नाच के रंग रूप देख लियाव.

नाच माने लौंडा नाच. ई विद्या शुरु कइसे भइल ई ठीक ठीक त पता नइखे लगावल जा सकत बाकिर अनुमान लगावल जा सकऽता. एह विद्या के जन्म ओह सारा लोकनाट्य भा परम्पराशील नाटकन लेखा भइल होई जवन संस्कृत नाट्य परंपरा के बंद भइला का बाद सगरी भारत में पसरल. एह नाट्यरूपन के दु गो रूप बा. एगो ऊ विधा जेहमें धार्मिक आधार रहे, जइसे – रास लीला, राम लीला, यक्षगान, कूडियाट्टम वगैरह. अधिकतर ई रूप मंदिर आ धर्म के सरंक्षण में पलल बढ़ल. लेकिन दोसर रूप ओह नाटकन के बा जेकर धर्म से रिश्ता ओतना ना रहे आ ओकरा के आम जनता अपनवलसि. नौटंकी, तमाशा, नाचा, माचा वगैरह अइसने नाटय रूप बाड़न स. नाचो अइसने नाट्य रूप ह. नाच के उत्पति के कहानी नाचा आ नौटंकी के उत्पति के कहानी से जोड़ल जा सकऽता. नाचा, जवन छत्तीसगढ़ के प्रमुख लोक नाट्य रूप ह, जेकरा के हबीब तनवीर दुनिया में मशहूर करा दिहले, के उद्भव के कहानी लोग बतावेला कि नाचा के शुरुआत शादी विवाह के अवसर पर होखे वाला नाच गाना के कार्यक्रम से भइल. बारात ओरात भा कहीं कवनो समाज के जुटानी पर लोग के मनोरंजन खातिर नाच गाना होखे. जइसे जइसे हारमोनियम , ढोलक आ तबला के आगमन होत गइल, नाचा के रूप बदलत गइल. खड़ा होके बाजा बजावे वाला लोग बईठ के बजावे लागल आ रात बितावेला ई महसुस कइल गइल कि खाली नाच गाना से काम ना चली, कवनो कहानी जोड़ल जाव. एह से ‘पाठ’ खेले के परंपरा के शुरूआत भइल. कलाकार अभिनय क के कवनो कहानी के प्रदर्शन करे लगलें. नौटंकी के जन्म के कहानी राजकुमारी नौटंकी आ फूल सिंह के कथा से जुड़ल बा. एही कथा के सुनावे के परंपरा धीरे धीरे नौटंकी शैली बन गइल आ एहमें दोसरो कथा सब जुड़ल चल गइल .

नाच ओही नाचा आ नौटंकी के मिलल जुलल रूप ह. नाच के कहानी के नाचा के कहानी से जोड़ल जा सकऽता. बिहार आ उत्तर प्रदेश में नाच एगो स्वतंत्र विधा का रूप में विकसित भइल. एकर विकसित होखे के एगो अउरो कारण ई बतावल जाला कि नौटंकी कंपनी सब एह क्षेत्रन में बहुत यात्रा करऽ सँ आ ओकरा आधार पर स्थानीय लोग आपन टीम बनावल लोग. नाचे गावे के परंपरा, लीला नाटक के परंपरा सब मिला जुला के नाच शुरु भइल होखी.

नाच, सब नाट्य रूपन लखा, देव वंदना से शुरू होला. ओकरा बाद महिला बनल पुरूष कलाकार, लौंडा, लोग गीत गावेला आ नाच करेला. ई नाच कुछ देर ले चलेला. पहिले नाच में गज़ल, खेमटा, ठुमरी, चैता, कजरी वगैरह कुल होखे लेकिन धीरे धीरे फ़िलिम के गीत एह गानन के हटावत गइले सँ. बाद में गा के नृत्य करे के परंपरा में रिकार्डिंग डान्स के परंपरो जुट गइल. कुछ देर के बाद जोकर, लबार, आके झलकी देखावला. ऊ अपना हास्य व्यंग्य से दर्शकन के हंसावेला. लबार हँसीए हँसी में गंभीरो बात कहि जाले सँ. बाद में गंभीर हास्य का जगह फूहड़ चुटकुला बाजी लेत गइल. लेकिन नाच में लबार अइसन किरदार होला जेकरा पर नाच के पूरा दारोमदार होला. नाच पार्टी के ऊ सबले महँग कलाकार होला. झांकी का बाद पाठ होला जेहमें कवनो कहानी के नाटकीय प्रदर्शन होखेला.

पाठ के चुनाव देख के लागेला कि नाच नौटंकी से प्रभावित रहे. काहे कि नाचो में सुल्ताना डाकू, लैला मजनु, सत्य हरिश्चन्द्र, अमर सिंह राठौड़ वगैरह के पाठ होखे. ई सब नौटंकी के प्रसिद्ध नाटक हऊअ सँ. नाच में रहे वाला लोगो बतावेला कि किताब कानपुर से आवे. लेकिन खाली नौटंकी तक ना रह के कुछ आउरियो नाटक होखे. जेकरा के कभी खुदहु गढ़े लागल लोग. जेहमें भिखारी आपन नाटक अपने लिखलें. कबो कबो कुछ फ़िलिमो के नाटकीय पाठ होखे.

नाच के मंच बहुत खुला स्वरूप वाला होला. अधिकतर एगो शामियाना का नीचे ई होला. शामियाना के बनावट अइसन होला कि ओकरा भीतरी घेरा में अंदर चार गो बांस एह तरे लागल रहेला कि एगो वर्ग बने. इहे वर्ग नाच के मंच ह. लगभग चारु ओर से दर्शक बइठेला. एक ओरी कलाकार लोग के आवे जाए के जगहा छोड़ल रहेला. नाच के बाजा सब उहे बा जे भारत के दोसरा लोकनाटकन के. जइसे कि हरमुनिया, नाल, नगाड़ा, क्ल्येरनाट, बैंजो. बाद में ड्रम सेटो एह बाजा में जोड़ा गइल. नगाड़ा नक्कारा के कहल जाला जेकर आवाज से नाच के शुरूआत होखे के पता चल जाला.

नाच में तीन तरह के लोग होले. एगो नचनिया होला. नचनिया मरदे बनेला. आजुओ नाच में मेहरारूवन के प्रवेश नइखे भइल. नचनिया बनावे खातिर पहिले नाच के मुंशी आ मालिक लोग गांवे-गांव घुम के लईका चुने लोग. किशोर लईका. फ़ेर ओकरा के ट्रेनिंग देवे लोग. एगो दोसरा यौनिकता के धारण कइला का बादो ई लोग सामान्य पुरुष जीवन जियेला लोग. नचनिया, जवना के लौंडो कहल जाला, नाच के प्रमुख अंग होला. नचनिया लोग के नाचे आ गावे दुनु कला में माहिर होखे के पड़ेला. दोसरा तरह के कलाकार होला जेकरा के एक्टर कहल जाला. नाच में अक्सर उमिरदराज नचनिया लोग एक्टर बन जाला. कुछ लोग शुरुवे से एक्टर बनेला. एक्टरो लोग के गाए, नाचे का साथे अभिनयो के प्रशिक्षण दिहल जाला. तेसर होला ऊ लोग जिनका के समाजी कहल जाला. समाजी लोग साज बजावेला, नाच पार्टी के सामान ढोएला. एह पुरा टीम, भा पार्टी, के जिम्मा मालिक आ मुंशी के होला. मालिक लोग सालाना का अनुबंध पर समाजी, नर्तकी आ एक्टर के राखेला. टीम के कमाई के मुख्य स्रोत होला लगन आ पर्व त्योहार के महीना. बाकिर समारोह आ पारिवारिक उत्सवो का मौका पर नाच पार्टी बोलावल करेला लोग. एह मौका पर नाच पार्टी साटा बान्हेला आ तय पइसा पर आयोजक किहां जाला. एह तरह से ई पूरा व्यावसायिक रंगमंच बा काहे कि एह कलाकारन के कमाई नाच से होला. साल के कुछ महीना खासकर के बरसात के महिना अभ्यास के महीना होला. एह घरी नाच दल मिलके अभ्यास, भा रिहर्सल, करेला. एही अभ्यास का बाद साल भर प्रदर्शन होला. पहिले मुंशी लोग के काम अभ्यास करावलो रहल.

समय का साथ एह लोक रंगमंच पर बहुत बदलाव आइल बा. टेक्नोलॉजी, आर्केस्ट्रा, मनोरंजन के बदलत परिभाषा, वैश्वीकरण इत्यादि के एक साथ प्रहार से एह मंच के शामियाना उखड़े लागल बा. अपना के बचावे लेल ई नाच रूप हर तरह के समझौता कइलसि. फूहड़पन त एहमें एतना आइल बा कि आम दर्शको धीरे धीरे एकरा से दूर हो गइल बाड़न. आर्केस्ट्रा एह मंच के बहुत नुकसान चहुँपवले बा. आर्केस्ट्रा अइला का बाद पुरुष नर्तकी, लौंडा, के मुकाबला महिला नर्तकी से हो गइल आ नारी देह के तुलना में पुरूष देह के भाव कम होत गइल. नचनिया से बढ़त छेड़-छाड़, सामाजिक अस्वीकृति से एह पेशा के केहू नइखे अपनावे चाहत. मंहगाई के एह दौर में आर्थिक सुरक्षा के अभावो कलाकारन के हड़कवले ना. नाच पार्टी धीरे धीरे बंद होखल जात बाड़ी सँ. जवन चलऽता उहो जइसे तइसे. पहिले के सामंती मानसिकता के लोग आ कम आय वाला लोगो नाच पार्टी बोलावल करत रहे लेकिन अब इहो लोग नाच के नइखे बोलावत.

सरकारो के एह नाट्य रूप पर कवनो ध्यान नइखे. ओकर कारण बा समाज में एकरा प्रति लोग के भाव. एक जमाना में मनोरंजन के मुख्य स्रोत रहल नाच से आज लोग अपना के जोड़े में आपन तौहीन बुझऽता. आर्केस्ट्रा आ डीजे का जमाना में नाच के के पूछऽता ? आ जवन समाज में ई पनपल ओही समाज के लोग जब एकरा से पीछा छोड़ावऽता, त अउर केहु का करी ? एकरा के बचावे ला केहु के ध्यान नइखे. आजकल के जमाना में परंपरा के बचावल के चाहऽता?

आखिर में फ़ेर एक बेर नागा के बाति. जीवन भर नाच से नाम आ धन कमाये वाला नागा के ओकरा घरे के लोग जीवन के उत्तरार्ध में उपेक्षित कर दिहल आ ताना मारल. ई जनला का बाद कि उनकर आधार नाच बा. आज ओह लोग के लाज लागऽता इ कहाए में कि उनुकर बाबुजी नचनिया हऊवें. लईका लोग के एह भावना ला समाजे जिम्मेदार बा. जे एगो कलाकार के कलाकार के इज्जत नइखे देत. ओकर नचनियापन आ जाति ओकर पहचान बन गइल बा. ओकरा कला के कवनो मोल नइखे. भोजपुरिया समाज के जवन क्षरन भइल बा ओहमे का ई मानसिकता जिम्मेवार नइखे ?

का बात बा कि एही विधा से भोजपुरी में भिखारी ठाकुर के महान कह के गुणगान कइल जात बा लेकिन उनुका समाज के अधिकांश लोग के हंसी के पात्र मान के तिरस्कृत कइल जात बा. वइसे भिखारीओ के कम तिरस्कार ना भइल रहे. बाद में लोग उनकर मूल्य बूझल. एह कलाकारन के का होई ? नागा हमरा से पुछलें कि नाच के का होई ? हमनी के सीखल बुद्धि के का होई? हम एह सवाल पर उनका के भूलिया दिहनी काहे कि हमरा लगे जवाब नइखे..खोजे के बा !

नाच पर खोजलो से कवनो किताब ना मिली. कुछ अनुभव, कुछ देखल नाच, कलाकारन से बातचीत पर ई लेख आधारित बा. एह लेख के परिष्कार ला सुझाव जरूरी बा. नाचा के विकास जाने में अनूप रंजन पांडेय जी से बातचीत सहायक भइल. जिनकर नाचा पर शोध बा. नौटंकी ला कैथरीन हेन्सन एगो किताब लिखले बाड़ी. चौमासा पत्रिको से एक आध लेख से सहयोग मिलल. कोशीश रही कि ई लेखन शृखंला में होखे. रउरा प्रतिक्रिया के इंतज़ार बा.


अमितेश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी में पी॰एचडी॰ कर रहल बाड़े.

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